Home धर्म-संस्कृति माता के तुल्य आदरणीय है प्रकृति : ममगाईं

माता के तुल्य आदरणीय है प्रकृति : ममगाईं

बदरीनाथ धाम। भू वैकुंठ धाम बदरीनाथ में चल रही श्रीमद्भागवत कथा का रसपान करा रहे आचार्य शिव प्रसाद ममगाईं ने श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए प्रकृति के प्रति सम्मान भाव प्रदर्शित करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि प्रकृति के त्रय गुणों अर्थात सत्व, रजस व तमस के असंतुलन का परिणाम ही उसके प्रदूषण का विकार है। इसी चिंतन के क्रम में प्रकृति के भारतीय दार्शनिकों ने यह सिद्धांत प्रतिपादित किया कि जिस प्रकार प्रकृति के प्रतिपादित सत्व, रजस व तामस गुणों के संतुलन में प्रकृति प्रदूषण विकार रहित होती है, उसी प्रकार प्रकृति का प्रतिनिधि शरीर पिंड भी कफ, अग्नि, पित्त तथा वायु वात की साम्यावस्था में दीर्घ काल तक विकार रहित रह सकता है। आयुर्वेद शास्त्र का आविर्भाव उक्त सिद्धांत पर अविलम्बित है। ज्योतिष्पीठ व्यास आचार्य शिव प्रसाद ममगाईं ने भारत सेवा आश्रम बद्रीनाथ में स्वर्गीय कैप्टन निशान्त नेगी की पुण्य स्मृति में चल रही श्रीमद्भागवत कथा में कहा कि अचेतन होने पर भी क्षीर दुग्ध की भांति प्रकृति की चेष्टा होती है, जिस प्रकार के स्तन से शिशु के लिए दुग्ध स्वतः निसृत होने लगता है, उसी प्रकार चेतन पुरुष के भोग के लिए प्रकृति चेष्टित होती है। प्रकृति निसृत भाव से स्वभावश प्रवृत्त होती है। अनादि काल के कर्मो के आकर्षण के प्रभाव से प्रकृति भी प्रवृत्त होती है अर्थात जीवात्मा जब तक कर्ता के साथ भोग करता है, तब तक प्रकृति अपने कर्म के द्वारा ही उसके लिए साधन उपलब्ध कराती है। वस्तुतः प्रकृति का कार्य परिणाम तो जीवात्मा के भोग हेतु सेवारत रहता है लेकिन वह सेविका है नहीं, बल्कि जिस प्रकार माता अपने शिशु के लिए स्वभाववश आहार पान तथा मल, शौच आदि कार्य सेवाभाव व मातृ भाव से करती है, उसी प्रकार प्रकृति भी जीवात्मा के लिए सभी प्रकार के भोग साधन प्रस्तुत करती है। अतः प्रकृति माता के तुल्य आदरणीय है। दर्शन शास्त्र के प्रथम सूत्र के अनुसार तीन प्रकार के दुखों का पूर्ण रूप अभाव प्रथम पुरुषार्थ मोक्ष है। ये तीन प्रकार के दुख क्रमशः आध्यात्मिक, आदिभौतिक तथा आदिदैविक हैं। इनसे पूर्णरूपेण निवृत्ति ही प्राणी का मुख्य उद्देश्य है। शास्त्रों में चार प्रकार के पुरुषार्थ कहे गए हैं- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। इनमें सर्वश्रेष्ठ पुरुषार्थ मोक्ष है जो कि सांख्य दर्शन सहित प्रायः सभी भारतीय दर्शनों का परम लक्ष्य है। सांख्य मत में प्रत्यक्षतः दिखाई देने वाले पदार्थो द्वारा दुख की पूर्णतः निवृत्ति नही होती है, कारण यह है कि भौतिक साधन अनित्य और निस्सार है, इनसे लौकिक आवश्यकताओं की पूर्ति तो हो सकती है, परंतु दुखो से पूर्णरूपेण मुक्ति नहीं मिल सकती है। मोक्ष के उत्कर्ष से उसकी सर्वश्रेष्ठता वेद द्वारा प्रतिपादित है। सांख्य दर्शन की मान्यता है कि दुखों का कारण अविवेक है और यह अविवेक प्रकृति और पुरुष आत्मा के परस्पर संयोग के कारण होता है। अतः सांख्य प्रकृति के मौलिक स्वरूप की दार्शनिक व्याख्या करने का प्रयास करता है क्योंकि सांख्य मतानुसार प्रकृति पुरुष विषयक ज्ञान हो जाने पर मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। 

इस अवसर पर मुख्य रूप से पुष्कर नेगी, रेखा नेगी, शुभम नेगी, आस्था, मधुर, संजय बिष्ट, मोनिका बिष्ट, अजय राय, धर्माधिकारी भुवन चन्द्र उनियाल, व्यास गुफा के मुख्य आचार्य हरीश कोठियाल, वेदपाठी आचार्य रविंद्र भट्ट, आचार्य देवेन्द्र कोठियाल, बाबा उदय सिंह, डॉ. हरीश गौड़ रविंद्र नेगी, प्रभा, मेहरबान सिंह माहरा, देवेन्द्र नेगी, पुष्पा सुंदरियाल सुरेंद्र पटवाल, चंद्रमोहन ममगाईं आदि उपस्थित रहे।

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