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राष्ट्र निर्माण में हिंदी का महत्वपूर्ण योगदान : पांडे

हिंदी दिवस पर हिंदी साहित्य समिति देहरादून की ओर से ऑनलाइन व्याख्यान का आयोजन

देहरादून। हिन्दी साहित्य समिति देहरादून की ओर से राष्ट्रीय हिन्दी दिवस  पर ” राष्ट्र निर्माण में हिन्दी का योगदान “विषय पर आनलाइन व्याख्यान आयोजित किया गया। जिसमें बतौर मुख्यअतिथि डॉ सुधा रानी पाण्डे पूर्व कुलपति संस्कृत विश्वविद्यालय ने कहा कि आज पूरे विश्व में लगभग 200 देशों में हिन्दी विश्वविद्यालय स्तर पर पढाई जा रही है और यह हिन्दी भाषा की ताकत है कि देश में ही नहीं विश्व में हिन्दी भाषी लोग हिन्दी का परचम फहरा रहे हैं। आजादी की लडाई तभी सफल हो पाई जब पूरा देश एक जुबान में एक जुट होकर आगे आया। यह भाषा की ताकत है और आज भी राष्ट्र निर्माण में हिन्दी का महत्वपूर्ण योगदान है। हिन्दी सरल, सुबोध और आसानी से समझ आने वाली भाषा है जिसमें सरल शब्दों में विचार व्यक्त किये जा सकते हैं और समझने में भी आसानी होती है।

मुख्य वक्ता डॉ सविता मोहन, पूर्व उच्च शिक्षा निदेशक उत्तराखंड एवं वरिष्ठ साहित्यकार ने कहा कि हिन्दी ही राष्ट्रीय एकता और सम्प्रेषण की वह कड़ी थी जिसने आजादी की लडाई में जन जन को एक सूत्र में पिरोने का कार्य किया,क्योंकि इसके बिना राष्ट्रीय चेतना का संचार सम्भव नहीं था उस कालखंड में। हमारे देश की संस्कृति और भाषा बहुलतावादी है। अनेक भाषाओं के साथ ही स्थानीय स्तर पर अनेक बोलियाँ बोली जाती हैं, किन्तु जब आजादी का आन्दोलन हुआ और राष्ट्रीय अस्मिता की रक्षा के लिए सब एकजुट होकर हिन्दी के झंडे के नीचे खडे हो गये और यही होती है सशक्त भाषा की ताकत। इसी भाषाई एकता के बल पर हम आजादी मिली और राष्ट्र के निर्माण में हिन्दी का यह महत्वपूर्ण योगदान है। विशिष्ट वक्ता असीम शुक्ल ने कहा कि हिन्दी ने हमेशा देश को एकसूत्र में पिरोने का कार्य किया। कुछ राजनीतिक स्वार्थ के लिए दक्षिण भारत मे लगभग 50 -55 वष॔ पूर्व हिन्दी का विरोध किया गया किन्तु वह विरोध मात्र सत्ता पाने के लिए ही था,जबकि दक्षिण भारत के अनेक विद्वानों ने हिन्दी के विकास में अपना बहुमूल्य योगदान दिया और दे रहे हैं। दक्षिण भारत से अनेक हिन्दी पत्र पत्रिकाओं का प्रकाशन होता रहा है। दक्षिण फिल्म उद्योग में एक समय बहुत हिन्दी फिल्मों का निर्माण हुआ। समय बदल गया है और आज दक्षिण भारत में हिन्दी का प्रचार प्रसार विद्यालयों में और आमजन में भी हो रहा है क्योंकि अब सभी यह समझ चुके हैं कि पूर्व पश्चिम उत्तर दक्षिण में सम्पक॔ केवल हिन्दी माध्यम से ही सम्भव है।

कार्यक्रम के अध्यक्ष डॉ रामविनय सिंह ने कहा कि हिन्दी साहित्य में भारतेन्दु युग स्वातन्त्र्य संग्राम से ओतप्रोत था।उस काल में जो भी हिन्दी साहित्य रचा गया उसने आम आदमी की भावनाओं को जागृत करने का काम किया। प्रेमचंद की कृति “होंगे वतन”को अंग्रेजी सरकार ने इसीलिए प्रतिबन्धित कर दिया था क्योंकि वह कृति देश प्रेम से ओतप्रोत थी, आज इस कृति के विषय में चर्चा हो रही है। इसी प्रकार उनकी रंग भूमि और कर्म भूमि भी राष्ट्र प्रेम पर आधारित थी। इसी प्रकार फणीश्वर नाथ रेणु के मैला आंचल, जुलूस, परती परिकथा और क्रान्तिकारी उपन्यास कार यशपाल के देश द्रोही, झूठा सच,दादा कामरेड, धर्म युद्ध आदि रचनाओं ने देश को जगाने के साथ ही एक सूत्र में पिरोने का कार्य किया। आज देश विदेश में अनेकानेक विश्वविद्यालयों में हिन्दी की कक्षाओं का संचालन इस बात की पुष्टि करता है आने वाला समय भारत और भारत की राष्ट्र भाषा हिन्दी का है।विदेशी लोग भी भारतीय संस्कृति और आध्यात्म में रूचि ले रहे हैं और उसके लिए हिन्दी सीख रहे हैं
यूक्रेन की विक्टोरिया ने भारतीय संस्कृति को जानने के लिए हिन्दी सीखी है। अनेक उदाहरण हैं। आज फिल्म उद्योग और विज्ञापन व्यवसाय में हिन्दी का अधिक से अधिक प्रयोग हो रहा है क्योंकि विश्व में हिन्दी भाषी लोग हिन्दी लगभग 80 करोड़ से अधिक है और आज के वैश्वीकरण में अधिक से अधिक आबादी तक पहुंचने का माध्यम उसकी भाषा ही है,इसलिए आज के सन्दर्भ में यह सही कथन है कि राष्ट्र के उत्कर्ष में हिन्दी का महत्वपूर्ण योगदान है।
हिन्दी साहित्य समिति के महामंत्री हेमवती नंदन कुकरेती ने कहा कि स्वामी विवेकानंद ने शिकागो में हिन्दी के महत्व और सामर्थ्य से विश्व का परिचय कराया था। हमारे अनेकानेक सांस्कृतिक संवाहकों ने समय-समय पर देश विदेश में हिन्दी और संस्कृत से सभी का परिचय कराया है। आज देश विदेश में और संयुक्त राष्ट्र संघ के सभी मंचों पर हमारे प्रधानमंत्री हिन्दी में उद्बोधन करते हैं और यह हमारी भाषा की ताकत है। आज पर्यटन उद्योग भी तभी सफल हो रहा है जब उससे जुड़े लोग स्थानीय भाषा के साथ हिन्दी की जानकारी रखते हों।हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि नये भारत में विकास के लिए हिन्दी का ज्ञान भी आवश्यक है।
इस मौके पर हिन्दी साहित्य समिति के महामंत्री हेमवती नंदन कुकरेती ने कोविडकाल में समिति के द्वारा आयोजित किए गये कार्यों का विवरण प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि हमने सितम्बर 2020 से निरन्तर राष्ट्रीय, अन्तराष्ट्रीय, सेमिनार, बेवीनार, साप्ताहिक, मासिक गोष्ठियों का आयोजन किया।
इस अवसर पर डॉ विजेन्द्र पाल सहारनपुर से, डॉ विद्या सिंह , डॉ राकेश बलूनी, डॉ इन्दिरा जुगरान टिहरी से, विजय रतूडी टिहरी से, राजन कपूर, राम अवतार देवप्रयाग से, नीता कुकरेती, डाली डबराल, संगीता शाह, शादाब अली, डॉ मुकुन्द नीलकंठ जोशी  पुणे से, मुनीश सक्सेना, मुनीराम सकलानी, डॉ सविता भट्ट, सतीश शुक्ला, क्षमा कौशिक, सुमन तिवारी, रजनीश त्रिवेदी, सुनील त्रिवेदी, डॉ अजय अनुपम मुरादाबाद से, विवेक त्यागी, अम्बर खरबन्दा, डॉ देवेन्द्र कुमार सिंह बनारस से, शालिनी शैतानी,सोम प्रकाश शर्मा, बलदेव चौहान, महिमा बधानी, इन्दुभूषण कोचगवे, राजन कपूर, असीम शुक्ल, कविता बिष्ट, डॉ आशा रावत, बीना बेंजवाल, डॉ सज्जन सिंह जमशेदपुर से, कंवलजीत कौर दिल्ली से, पवन शर्मा, शिवमोहन सिंह सहित अनेक साहित्यकार आनलाइन सम्मिलित हुए।

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